मंदिर स्थापत्य की नागर शैली की प्रमुख विशेषताएं | Naagar Shaili Ki Vishestaye B.A 3rd Year Notes

मंदिर स्थापत्य की नागर शैली की प्रमुख विशेषताएं
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इस पोस्ट में हम मंदिर स्थापत्य की नागर शैली की प्रमुख विशेषताएं के बारे में वर्णन करेंगे। इस पोस्ट में हम नागर शैली का परिचय देंगे फिर नागर शैली की प्रमुख विशेषताओं के बारे में जानेंगे।

परिचय

नागर शैली उत्तर भारतीय हिंदू मंदिर वास्तुकला की एक प्रमुख शैली है, जो विशेष रूप से हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक विस्तारित क्षेत्र में विकसित हुई है। ‘नागर’ शब्द की उत्पत्ति ‘नगर’ से हुई मानी जाती है, जो इस शैली के नगरों में निर्माण से संबंधित होने को दर्शाता है।

मंदिर स्थापत्य की नागर शैली की प्रमुख विशेषताएं

मंदिर स्थापत्य की नागर शैली की प्रमुख विशेषताएं | Naagar Shaili Ki Vishestaye
1. वर्गाकार या आयताकार योजना

नागर शैली के मंदिरों की योजना आमतौर पर वर्गाकार या आयताकार होती है, जिसमें गर्भगृह, मंडप, और अन्य उपांग एक सीधी रेखा में जुड़े होते हैं।

2. ऊँचे और संकुचित शिखर

इन मंदिरों में शिखर (मंदिर का शीर्ष भाग) ऊँचा, संकुचित और ढलवां (पिरामिडनुमा) होता है, जो ऊपर जाते हुए क्रमशः पतला होता जाता है।

3. आंतरिक और बाह्य नक्काशी

मंदिरों की दीवारों, स्तंभों और अन्य हिस्सों पर जटिल और सुंदर नक्काशी की जाती है, जिसमें देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और अन्य धार्मिक प्रतीकों की मूर्तिकला शामिल होती है।

4. मंडप और सभामंडप की उपस्थिति

नागर शैली के मंदिरों में गर्भगृह के सामने एक या एक से अधिक मंडप (प्रवेश हॉल) होते हैं, जहाँ भक्त पूजा और अन्य धार्मिक गतिविधियाँ करते हैं।

5. पंचायतन योजना

कुछ मंदिरों में मुख्य गर्भगृह के चारों कोनों पर छोटे उप-मंदिर स्थित होते हैं, जिन्हें मिलाकर ‘पंचायतन’ कहा जाता है, जिसमें कुल पाँच मंदिर होते हैं।

6. आमलक और कलश का उपयोग

शिखर के शीर्ष पर आमलक (एक गोलाकार पत्थर) और कलश (धातु या पत्थर का पात्र) स्थापित होते हैं, जो वास्तुशास्त्र और धार्मिक प्रतीकवाद में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

7. प्राकार और प्रवेश द्वार

मंदिरों के चारों ओर एक प्राकार (दीवार) होती है, जिसमें सुंदर प्रवेश द्वार होते हैं, जो वास्तुशिल्प और धार्मिक महत्व को प्रदर्शित करते हैं।

8. सामग्री का उपयोग

नागर शैली के मंदिरों में मुख्य रूप से पत्थर और ईंटों का उपयोग किया जाता था। पत्थर का उपयोग मंदिर की संरचना को मजबूती और स्थायित्व देने के लिए किया जाता है। विशेष रूप से बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट का उपयोग मंदिर निर्माण में किया जाता था।

9. आंतरिक और बाहरी भाग का संतुलन

नागर शैली के मंदिरों में आंतरिक और बाहरी भागों के बीच संतुलन बनाए रखा जाता है। आंतरिक भाग में गर्भगृह और मंडप होते हैं, जो पूजा के लिए एक शांतिपूर्ण और दिव्य वातावरण उत्पन्न करते हैं। बाहरी हिस्से को सजाने के लिए नक्काशी और चित्रकला का उपयोग किया जाता है, जो मंदिर की सुंदरता को बढ़ाता है और धार्मिक कथाओं और मान्यताओं को व्यक्त करता है।

10. मंदिर की योजना और आकार

नागर शैली के मंदिरों का आकार आमतौर पर आयताकार या चौकोर होता है। इन मंदिरों की संरचना इस प्रकार होती है कि गर्भगृह, मंडप और अन्य हिस्से एक निश्चित योजना के तहत व्यवस्थित होते हैं। यह मंदिरों की कार्यक्षमता और भव्यता को बढ़ाता है। मंदिर का केंद्रीय हिस्सा जहाँ गर्भगृह होता है, उसे प्रमुखता दी जाती है, जबकि अन्य हिस्सों को इससे जोड़ने के लिए मंडप और प्राकार होते हैं।

प्रमुख उदाहरण:

काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी): यह मंदिर नागर शैली का एक प्रमुख उदाहरण है, जहाँ शिखर की ऊँचाई और जटिल नक्काशी विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।

लक्ष्मण मंदिर (खजुराहो): यह मंदिर भी नागर शैली के स्थापत्य का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें शिखर, गर्भगृह, और मंडप की सुंदर संरचना पाई जाती है।

राजराजेश्वर मंदिर (तंजावुर): यह मंदिर दक्षिण भारत में स्थित है और नागर शैली की विशेषताएँ प्रदर्शित करता है।

निष्कर्ष

नागर शैली की मंदिर स्थापत्य भारतीय वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य दृष्टि से अद्वितीय है। शिखर, गर्भगृह, मंडप, मूर्तिकला और नक्काशी की सुंदरता ने इस शैली को विशिष्ट और प्रभावशाली बना दिया है। नागर शैली के मंदिर भारतीय कला और संस्कृति के प्रतीक हैं और आज भी उनकी भव्यता और स्थापत्य कला का अध्ययन किया जाता है।


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